Tuesday, November 24, 2020

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में अंतर होता है – What is Repo Rate & Reverse Repo Rate

रेपो दर (Repo Rate)

बैंकों को अपने दैनिक कामकाज के लिए प्राय: ऐसी बड़ी रकम की जरूरत होती है जिनकी मियाद एकदिन से ज्यादा नहीं होती. इसके लिए बैंक जो विकल्प अपनाते हैं, उनमें सबसे सामान्य केंद्रीय बैंक से रात भर के लिए (ओवरनाइट) कर्ज लेना. इस कर्ज पर रिजर्व बैंक को उन्हें जो ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रेपो दर कहते हैं.

रेपो दर में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से रात भर के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा.

साफ है कि बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, वह भी उन्हें बढ़ाना होगा. इसके उलट रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाएगा और इसलिए बैंक ब्याज दरों मे कमी करेंगे ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम कर्ज़ के तौर पर दी जा सके.

रेपो रेट कौन तय करता है?

RBI गवर्नर मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक की अध्यक्षता करता है, जिसमें निम्नलिखित अवधि के लिए रेपो दर या वर्तमान रेपो दर तय की जाती है।

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट का उपयोग मुद्रास्फीति (Inflation)और मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए कैसे किया जाता है:

उच्च दर शासन (High Rate Regime): जब RBI रेपो दर को उच्च रखता है, तो बैंक धन की उच्च लागत के कारण केंद्रीय बैंक से कम पैसा उधार लेते हैं। विशेष रूप से, रिवर्स रेपो दर भी रेपो रेट के साथ मिलकर उच्च है। यह बैंकों को इस पर अधिक आय के कारण, आरबीआई के साथ अपने अधिक धन को रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

निम्न दर शासन (Low Rate Regime): इसके विपरीत, जब RBI रेपो दर को कम रखता है, तो बैंक कम लागत पर इससे अधिक धनराशि उधार ले सकते हैं। एक ही नस में, रेपो रेपो रेट भी रेपो रेट के अनुरूप कम है। इस प्रकार, बैंक केंद्रीय बैंक में कम पैसा लगाने के लिए इच्छुक हैं, क्योंकि यह कम रिटर्न प्राप्त करेगा।

रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate)

नाम के ही मुताबिक रिवर्स रेपो दर ऊपर बनाए गए रेपो दर से उल्टा होता है. बैंकों के पास दिन भर के कामकाज के बाद बहुत बार एक बड़ी रकम शेष बच जाती है. बैंक वह रकम अपने पास रखने के बजाए रिजर्व बैंक में रख सकते हैं. जिस पर उन्हें रिजर्व बैंक से ब्याज भी मिलता है. जिस पर यह ब्याज मिलता है, उसे रिवर्स रेपो दर कहते हैं. 

अगर रिजर्व बैंक को लगता है कि बाजार में बहुत ज्यादा तरलता (लिक्विडिटी) है, तो वह रिवर्स रेपो दर में बढ़ोतरी कर देता है, जिसे बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपना धन रिजर्व बैंक के पास रखने को प्रोत्साहित होते हैं और इस तरह उनके पास बाजार में छोड़ने के लिए कम धन बचता है.

नकद आरक्षी अनुपात (Cash Reserve Ratio)

सभी बैंकों के लिए जरूरी होता है कि वह अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास जमा रखें. इसे नकद आरक्षी अनुपात कहते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि अगर किसी भी मौके पर एक साथ बहुत बड़ी संख्या में जमाकर्ता अपना पैसा निकालने आ जाए तो बैंक डिफॉल्ट ना कर सके. आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बिना बाजार से तरलता (लिक्विडिटी) कम करना चाहता है, तो वह सीआरआर (CRR) बढ़ा देता है.

हाल ही में रिजर्व बैंक को मौद्रिक नीति की सालाना समीक्षा के बाद सीआरआर 8.25 फीसदी हो गया है, यानी बैंकों को अब अपने 100 रुपये के कैश रिजर्व 8.25 रूपये का रिजर्व रखना होगा. इससे बैंकों के पास बाजार में कर्ज देने के लिए कम रकम बचेगी, लेकिन रेपो और रिवर्स रिपो दरों में कोई बदलाव नहीं किए जाने से काँस्ट ऑफ फंड पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

रेपो और रिवर्स रेपो दरें आर बी आई के प्रभावी कदम के रूप में तरलता को तुरंत प्रभावित करने वाले हथियार माने जाते हैं जबकि सीआरआर से सरलता पर तुलनात्मक तौर पर ज्यादा समय में असर पड़ता है.

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